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इच्छामृत्यु का द्वंद्व: जीवन की पवित्रता और गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार के बीच का नाज़ुक संतुलन

सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु, अग्रिम चिकित्सा निर्देश (लिविंग विल) तथा असाध्य मानवीय पीड़ा के न्यायशास्त्र का एक गहन जैव-नैतिक विश्लेषण।

Compassionate caregiver holding hands of patient in hospice care - dilemma about euthanasia right to die with dignity medical ethics autonomy

आधुनिक मानव सभ्यता में शायद ही कोई ऐसा नैतिक द्वंद्व हो जो मानवीय अस्तित्व के अंतिम क्षणों को लेकर इतनी तीव्र नैतिक बेचैनी, धार्मिक उथल-पुथल और कानूनी जटिलता पैदा करता हो जितना कि इच्छामृत्यु का प्रश्न।

1. असहनीय पीड़ा की दहलीज: जब चिकित्सा तकनीक मृत्यु को पीछे छोड़ देती है

किस प्रकार आधुनिक गहन चिकित्सा इकाई ने मानव जीवन के अंतिम अध्याय को सदा के लिए बदल दिया

आधुनिक मानव सभ्यता में शायद ही कोई ऐसा नैतिक द्वंद्व हो जो मानवीय अस्तित्व के अंतिम क्षणों को लेकर इतनी तीव्र नैतिक बेचैनी, धार्मिक उथल-पुथल और कानूनी जटिलता पैदा करता हो जितना कि इच्छामृत्यु का प्रश्न। मानव इतिहास के हजारों वर्षों के दौरान मृत्यु एक प्राकृतिक, अपरिहार्य और स्वतःस्फूर्त घटना मानी जाती रही थी। जब कोई असाध्य व्याधि, जानलेवा संक्रमण या गंभीर शारीरिक आघात शरीर की जैविक क्षमताओं को पूरी तरह तोड़ देता था, तो हृदय की धड़कन मंद पड़ जाती थी, फेफड़ों की सांसें थम जाती थीं और कुछ ही घंटों अथवा गिने-चुने दिनों के भीतर जीवन की अंतिम विदाई संपन्न हो जाती थी। उस दौर में जीवित रहने और मृत्यु के आगोश में समा जाने के बीच की विभाजन रेखा अत्यंत स्पष्ट, शुद्ध रूप से जैविक और समाज में निर्विवाद थी।

परंतु बीते लगभग पांच दशकों में कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन (सीपीआर), सकारात्मक दबाव वाले यांत्रिक वेंटिलेटर, निरंतर हेमोडायलिसिस और कुल पैरेंट्रल पोषण के असाधारण वैज्ञानिक आविष्कारों ने गहन चिकित्सा कक्षों (आईसीयू) की पूरी तस्वीर को आमूलचूल रूप से बदलकर रख दिया है। आज की आधुनिक बायोमेडिकल तकनीक में यह विस्मयकारी क्षमता आ चुकी है कि वह कोशिकीय चयापचय, रक्त परिसंचरण और ऊतकों में ऑक्सीजन के प्रवाह को अनिश्चित काल तक कृत्रिम रूप से चालू रख सकती है। यह तब भी संभव हो पाता है जब मस्तिष्क के सोचने-समझने वाले सेरेब्रल कॉर्टेक्स का पूर्ण विनाश हो चुका हो और असाध्य रूप से बीमार व्यक्ति असहनीय, लाइलाज और नारकीय शारीरिक यंत्रणा से जूझ रहा हो। भौतिक सांसों को अनंत काल तक मशीनों के सहारे खींचा जा सकता है।

इस अपार तकनीकी सामर्थ्य ने अनजाने में विश्व भर के अस्पतालों में एक अत्यंत पीड़ादायक जैव-नैतिक संशय को जन्म दे दिया है। आईसीयू वार्डों में डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी और आंसुओं में डूबे लाचार परिजन हर रोज एक अत्यंत हृदयविदारक सवाल के सामने निरुत्तर खड़े होते हैं: क्या हम किसी चेतनावान इंसान के गरिमापूर्ण जीवन की रक्षा कर रहे हैं, अथवा हम केवल मशीनों के क्रूर सहारे एक अत्यंत दर्दनाक और अमानवीय मृत्यु प्रक्रिया को बिना वजह लंबा खींचते जा रहे हैं? जैसे-जैसे आधुनिक समाज में बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है और अल्जाइमर व कैंसर जैसी असाध्य बीमारियां फैल रही हैं, इच्छामृत्यु पर नैतिक बहस शैक्षणिक सम्मेलनों से निकलकर हर घर की दहलीज पर खड़ी एक सजीव वास्तविकता बन चुकी है।

यह गंभीर संकट आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों को इस बात के लिए विवश कर रहा है कि वे व्यक्तिगत स्वायत्तता, राज्य के संवैधानिक दायित्वों और पारंपरिक चिकित्सीय पितृसत्ता से जुड़े अपने पुरातन विश्वासों का पुनर्मूल्यांकन करें। सदियों से समाज में चिकित्सक को एक ऐसा परम दयालु लेकिन निरंकुश मार्गदर्शक माना जाता था, जिसका एकमात्र कर्तव्य किसी भी कीमत पर सांसों को चालू रखना था। लेकिन आज की संवैधानिक चेतना यह मानती है कि मरीज कोई लाचार वस्तु नहीं हैं जिन पर उनकी इच्छा के विरुद्ध यांत्रिक प्रयोग किए जाएं; वे स्वतंत्र नागरिक हैं जिनकी व्यक्तिगत आस्था, आध्यात्मिक गरिमा और अपनी पीड़ा सहने की व्यक्तिगत सीमा का चिकित्सा विज्ञान के सभी तकनीकी उपकरणों से कहीं अधिक सम्मान किया जाना चाहिए। (संबंधित विषयों पर अधिक गहन समझ के लिए हमारे विशेष निबंध शरणार्थी संकट वैश्विक नैतिकता की विफलता को उजागर करता है को भी पढ़ें।)

विचार: जब आधुनिक चिकित्सा उपकरण किसी मृतप्राय शरीर के अंगों को मशीनों के सहारे अनंत काल तक चला सकते हैं, तो यह तय करने का अंतिम नैतिक अधिकार किसे होना चाहिए कि अब उपचार रोक दिया जाए?

2. कानूनी वर्गीकरण: सक्रिय, निष्क्रिय इच्छामृत्यु और सहायता प्राप्त आत्महत्या

जीवन के अंतिम पड़ाव से जुड़े चिकित्सा न्यायशास्त्र की स्पष्ट सीमाओं का सटीक विश्लेषण

इस गहन विमर्श को न्यायसंगत और बौद्धिक रूप से सही दिशा देने के लिए सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु के कानूनी और व्यावहारिक अंतर को बारीकी से समझना अनिवार्य है। प्राचीन यूनानी शब्दों ‘यू’ (अच्छा या सुखद) और ‘थानाटोस’ (मृत्यु) से मिलकर बना शब्द इच्छामृत्यु (Euthanasia) मूलतः एक शांत, गरिमापूर्ण और पीड़ारहित मृत्यु का द्योतक है। तथापि, जिस माध्यम और पद्धति से यह अंतिम शांति प्रदान की जाती है, उसके आधार पर अंतरराष्ट्रीय कानून और चिकित्सा नीतिशास्त्र में इसके नितांत भिन्न परिणाम निर्धारित किए गए हैं।

सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) का तात्पर्य उस स्थिति से है जहां एक पंजीकृत चिकित्सक किसी मरीज की स्पष्ट, सचेत, स्वतंत्र और बार-बार की गई प्रार्थना पर जानबूझकर सीधे तौर पर किसी घातक दवा (जैसे बार्बिट्यूरेट्स या पोटेशियम क्लोराइड का इंजेक्शन) का प्रयोग करता है ताकि उसके असहनीय शारीरिक कष्ट को तुरंत समाप्त किया जा सके। इसके विपरीत, निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) में मरीज को सीधे मारने के लिए कोई घातक दवा नहीं दी जाती, बल्कि जीवन को कृत्रिम रूप से खींचने वाले अनावश्यक और असाध्य उपकरणों (जैसे मैकेनिकल वेंटिलेटर, डायलिसिस या कृत्रिम श्वसन नली) को हटा लिया जाता है या उनका प्रयोग नहीं किया जाता, जिससे मूल असाध्य बीमारी अपनी स्वाभाविक गति से शरीर को शांत कर देती है।

एक अन्य महत्वपूर्ण कानूनी अंतर चिकित्सक-सहायता प्राप्त आत्महत्या (Assisted Dying) और सक्रिय इच्छामृत्यु के बीच मौजूद है। सहायता प्राप्त मृत्यु में चिकित्सक कानूनी प्रावधानों के तहत प्राणघातक दवा केवल लिखकर मरीज को सौंपता है, लेकिन मरीज पूरी तरह अपने हाथ से स्वयं उस दवा का सेवन करता है, जिसमें किसी तीसरे व्यक्ति का भौतिक हस्तक्षेप नहीं होता। वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों का दृष्टिकोण इस पर अत्यधिक भिन्न है: नीदरलैंड, बेल्जियम, कनाडा, स्पेन और कोलंबिया जैसे देशों में कड़े कानूनी नियमों के तहत सक्रिय और सहायता प्राप्त इच्छामृत्यु दोनों मान्य हैं, जबकि स्विट्जरलैंड और अमेरिका के कई राज्यों में केवल सहायता प्राप्त मृत्यु की अनुमति है और सक्रिय रूप से दवा देना गैरकानूनी है। (प्रामाणिक शोध और सांख्यिकीय संदर्भों के लिए Stanford Encyclopedia of Philosophy — Voluntary Euthanasia का संदर्भ लें।)

विचार: क्या किसी मरीज का वेंटिलेटर बंद करने और उसे शांत करने वाली दवा देने में कोई बुनियादी नैतिक अंतर है, जब दोनों ही कार्यों का एकमात्र उद्देश्य मरीज को असहनीय कष्ट से मुक्ति दिलाना है?

3. नैतिक युद्धक्षेत्र: जीवन की पवित्रता बनाम गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार

रोनाल्ड ड्वॉर्किन का दर्शन, कांट का नीतिशास्त्र और राज्य के जबरन हस्तक्षेप की सीमाएं

इस व्यापक विवाद के केंद्र में दर्शनशास्त्र की दो विशालकाय और ऐतिहासिक विचारधाराएं आमने-सामने खड़ी हैं: जीवन की पवित्रता का सिद्धांत (Sanctity of Life) और मानव गरिमा तथा व्यक्तिगत स्वायत्तता का सिद्धांत (Autonomy and Human Dignity)। जीवन की पवित्रता का सिद्धांत, जो धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक प्राकृतिक विधि में गहराई से समाया हुआ है, यह मानता है कि मानव जीवन एक दिव्य, असीम और अमूल्य उपहार है जो ईश्वर या प्रकृति द्वारा प्रदत्त है। इस दृष्टिकोण के अनुसार सांसारिक जीवन पूर्णतः अहस्तांतरणीय है; किसी भी मनुष्य को अपने जीवन को समाप्त करने का नैतिक अधिकार नहीं है और हिप्पोक्रेटिक शपथ लेने वाला कोई भी चिकित्सक किसी धड़कन को जानबूझकर शांत करने का भागीदार नहीं बन सकता।

इच्छामृत्यु का विरोध करने वाले विचारक ‘फिसलन भरी ढलान’ (Slippery Slope) के गंभीर सामाजिक खतरे की ओर निरंतर सचेत करते हैं। उनका अकाट्य तर्क है कि एक बार जब कोई समाज कानूनी रूप से असाध्य बीमारियों से पीड़ित सचेत वयस्कों के जीवन को समाप्त करने की छूट दे देता है, तो समय के साथ यह सुरक्षात्मक सीमाएं अवश्य कमजोर पड़ जाती हैं। अस्पतालों के वित्तीय संकट, परिवारों पर आर्थिक और भावनात्मक बोझ तथा वृद्धजनों के प्रति सामाजिक उपेक्षा के कारण वृद्ध, मानसिक अवसाद से ग्रस्त या दिव्यांग लोग अपने को बोझ मानकर असमय मृत्यु चुनने के लिए मानसिक रूप से विवश हो सकते हैं, जिससे जीने का अधिकार कर्तव्य में बदल जाएगा।

इसके विपरीत, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक—जो जॉन स्टुअर्ट मिल और प्रसिद्ध कानूनविद रोनाल्ड ड्वॉर्किन के दर्शन से प्रेरणा लेते हैं—यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि मानव जीवन को केवल हृदय की जैविक धड़कन या अंगों का चलना मात्र गरिमा प्रदान नहीं करता, बल्कि सोचने की चेतना, प्रेम करने की शक्ति और अपने मूल्यों के अनुसार निर्णय लेने की आजादी उसे महान बनाती है। ड्वॉर्किन ने अपनी विश्वविख्यात पुस्तक ‘लाइफ्स डोमिनियन’ में स्पष्ट लिखा कि किसी विवेकशील व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध घोर अमानवीय यातना सहने के लिए विवश करना उसकी आत्मा पर गहरा आघात है। किसी समझदार व्यक्ति को शांत विदाई से वंचित करना उसे राज्य की बेजान संपत्ति में तब्दील कर देता है। (संबंधित विषयों पर अधिक गहन समझ के लिए हमारे विशेष निबंध वृद्धावस्था में अवसाद: लक्षण, कारण और गरिमापूर्ण पुनर्प्राप्ति के मार्ग को भी पढ़ें।)

विचार: यदि हमारे संविधान विवाह, धर्म, विचार और अभिव्यक्ति की आजादी की पूरी रक्षा करते हैं, तो किसी इंसान की यह संप्रभु आजादी अपने जीवन के अंतिम क्षणों का चयन करते समय क्यों छीन ली जानी चाहिए?

4. भारतीय न्यायशास्त्र का ऐतिहासिक मोड़: अरुणा शानबाग से लिविंग विल के अधिकार तक

सुप्रीम कोर्ट ने किस प्रकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मान्यता दी

भारत में जीवन के अंतिम पड़ाव से जुड़े कानूनी न्यायशास्त्र का विकास विश्व के सबसे संवेदनशील और बौद्धिक रूप से समृद्ध संवैधानिक अध्यायों में गिना जाता है। इस युगांतरकारी बदलाव की धुरी मुंबई के केईएम अस्पताल की कर्मठ नर्स अरुणा शानबाग की हृदयविदारक त्रासदी बनी। वर्ष 1973 में अस्पताल में हुए एक पाशविक यौन हमले के दौरान अरुणा के मस्तिष्क तक ऑक्सीजन का प्रवाह रुक गया था, जिसके चलते वे लगातार लगभग बयालीस वर्षों तक परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट (स्थायी अचेतन अवस्था) में केवल नेसोगैस्ट्रिक फीडिंग ट्यूब के सहारे जीवित रहीं।

वर्ष 2011 में प्रसिद्ध पत्रकार और लेखिका पिंकी विरानी ने सुप्रीम कोर्ट में एक ऐतिहासिक याचिका दायर कर अरुणा को मशीनी पोषण से मुक्त कर शांतिपूर्वक जाने देने की अनुमति मांगी। हालांकि अदालत ने उस समय केईएम अस्पताल के सेवाभावी स्टाफ की भावनाओं का सम्मान करते हुए उनकी ट्यूब हटाने से मना कर दिया, लेकिन जस्टिस मार्कंडेय काटजू की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने भारत में कड़े न्यायिक दिशा-निर्देशों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) को वैध घोषित कर एक युगांतरकारी इतिहास रच दिया।

इसके सात वर्ष पश्चात, मार्च 2018 में, देश के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने ‘कॉमन कॉज बनाम भारत संघ’ मामले में अत्यंत ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट घोषणा की कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले मौलिक ‘जीवन के अधिकार’ में स्वाभाविक रूप से ‘गरिमा के साथ मरने का अधिकार’ भी शामिल है। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रत्येक स्वस्थ मस्तिष्क वाले वयस्क नागरिक को अवांछित चिकित्सा लेने से मना करने का पूरा अधिकार है और उसने अग्रिम चिकित्सा निर्देश (Living Will) को कानूनी मान्यता प्रदान की। (प्रामाणिक शोध और सांख्यिकीय संदर्भों के लिए Dignity in Dying — Ethical Care & Rights का संदर्भ लें।)

विचार: अरुणा शानबाग के चार दशकों के मौन और असहनीय एकाकी संघर्ष ने किस प्रकार 140 करोड़ नागरिकों के लिए मानवीय गरिमा की संवैधानिक परिभाषा को सदा के लिए बदल दिया?

5. लिविंग विल: अचेतन अवस्था में जाने से पहले अपनी इच्छा को कानूनी रूप देना

अग्रिम चिकित्सा निर्देशों को तैयार करने और अमल में लाने की सरल व्यावहारिक मार्गदर्शिका

मरीज की स्वायत्तता का वास्तविक क्रियान्वयन ‘लिविंग विल’ अथवा अग्रिम चिकित्सा निर्देश (Advance Medical Directive) के माध्यम से संभव होता है। यह एक ऐसा आधिकारिक कानूनी दस्तावेज होता है जिसे कोई भी बालिग और स्वस्थ मस्तिष्क वाला व्यक्ति पहले से तैयार करता है। इसमें वह स्पष्ट रूप से यह लिखता है कि यदि भविष्य में वह किसी लाइलाज बीमारी, स्थायी कोमा या असाध्य शारीरिक स्थिति में पहुंच जाए और बोलने में असमर्थ हो, तो उस पर कौन से यांत्रिक जीवन रक्षक उपाय लागू किए जाएं और कौन से उपाय कतई न किए जाएं।

शुरुआत में वर्ष 2018 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई प्रक्रिया अत्यंत जटिल और न्यायिक मजिस्ट्रेटों के चक्कर लगाने वाली थी, जिसके कारण सामान्य नागरिकों के लिए लिविंग विल बनवाना लगभग असंभव हो गया था। इस गंभीर व्यावहारिक अड़चन को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2023 में ऐतिहासिक संशोधन किया। अब लिविंग विल केवल दो स्वतंत्र गवाहों की उपस्थिति में किसी नोटरी या राजपत्रित अधिकारी के समक्ष आसानी से निष्पादित की जा सकती है और इसे डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड में सुरक्षित रखा जा सकता है।

जब कोई मरीज किसी अस्पताल में ऐसी लाइलाज स्थिति में पहुंचता है जहां से सुधार संभव नहीं होता, तो अस्पताल एक प्राथमिक मेडिकल बोर्ड गठित करता है। यदि प्राथमिक बोर्ड यह प्रमाणित करता है कि लिविंग विल के अनुसार अब केवल वेंटिलेटर या ट्यूब के जरिए व्यर्थ पीड़ा बढ़ाई जा रही है, तो दूसरा स्वतंत्र समीक्षा बोर्ड 48 घंटों में इसकी पुष्टि करता है। यह दोहरी सुरक्षा प्रणाली मरीज की पवित्र इच्छा का पूर्ण सम्मान भी करती है और किसी भी दुर्भावनापूर्ण पारिवारिक लापरवाही से मरीज के जीवन की पूरी हिफाजत भी सुनिश्चित करती है। (संबंधित विषयों पर अधिक गहन समझ के लिए हमारे विशेष निबंध भटकने वाले हर व्यक्ति की दिशा खोई नहीं होती: उद्देश्यपूर्ण अन्वेषण की शक्ति को भी पढ़ें।)

विचार: अधिकांश परिवार अपने प्रियजनों के स्वस्थ रहते अग्रिम चिकित्सा निर्देश क्यों नहीं बनवाते, जिसके चलते अचानक आईसीयू संकट आने पर उन्हें असहनीय मानसिक आघात का सामना करना पड़ता है?

6. तीसरा और मानवीय मार्ग: उपशामक चिकित्सा (Palliative Care) की संजीवनी

सुलभ और निपुण दर्द निवारण किस प्रकार इच्छामृत्यु के नैतिक द्वंद्व का वास्तविक समाधान करता है

सख्त कानूनी प्रतिबंधों और सीधे जीवन समाप्त करने की उग्र मांगों के बीच विश्व का चिकित्सा विज्ञान एक निर्विवाद सत्य सामने रखता है: असाध्य रोगों से जूझ रहे जो मरीज मौत की गुहार लगाते हैं, वे वास्तव में जीवन समाप्त नहीं करना चाहते—वे केवल अपने शरीर को चीरने वाले असहनीय दर्द, दम घुटने की घुटन और अकेलेपन के डर से तत्काल मुक्ति चाहते हैं। दर्द निवारण की कमी ही मौत की इच्छा का सबसे बड़ा कारण होती है।

उपशामक चिकित्सा (Palliative Care) चिकित्सा विज्ञान की वह विशेष विधा है जो गंभीर व असाध्य बीमारियों से पीड़ित मरीजों और उनके परिजनों के शारीरिक दर्द, सांस की तकलीफ, उल्टी और मानसिक अवसाद को दूर कर उनके जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाती है। आधुनिक पैलिएटिव केयर—जिसमें सटीक मॉर्फिन दर्द निवारक, नर्व ब्लॉक, मनोचिकित्सीय संबल और जीवन के अंतिम दिनों में दर्द निवारक बेहोशी (Palliative Sedation) शामिल हैं—कैंसर और ऑर्गन फेलियर के 95 प्रतिशत से अधिक मामलों में असहनीय शारीरिक पीड़ा को पूरी तरह समाप्त करने में सक्षम है।

जिन देशों में पैलिएटिव केयर हर नागरिक के लिए सुलभ और निःशुल्क है, वहां इच्छामृत्यु की मांग नगण्य हो जाती है। किसी भी आधुनिक सभ्यता की वास्तविक परीक्षा केवल इच्छामृत्यु के कानून बनाने में नहीं है, बल्कि इस बात में है कि वह अपने सबसे कमजोर और लाचार नागरिकों के अंतिम पलों में कितना स्नेह, दर्द निवारण और सम्मान दे पाती है। किसी भी इंसान को मौत की भीख मांगने पर विवश नहीं होना चाहिए सिर्फ इसलिए कि हमारी स्वास्थ्य प्रणाली उसे समय पर दर्द से राहत और अंतिम पलों में सम्मानजनक मानवीय सहारा नहीं दे सकी। (प्रामाणिक शोध और सांख्यिकीय संदर्भों के लिए World Health Organization — Palliative Care Principles का संदर्भ लें।)

विचार: यदि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान पैलिएटिव सेडेशन के जरिए अंतिम पलों के शारीरिक दर्द को पूरी तरह समाप्त कर सकता है, तो इससे सक्रिय इच्छामृत्यु की नैतिक आवश्यकता किस प्रकार प्रभावित होती है?

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) और निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) में मुख्य अंतर क्या है?

सक्रिय इच्छामृत्यु में डॉक्टर मरीज की प्रार्थना पर जानबूझकर सीधे कोई प्राणघातक दवा देकर जीवन का अंत करता है ताकि असहनीय कष्ट रुक सके। जबकि निष्क्रिय इच्छामृत्यु में जीवन रक्षक मशीनों या वेंटिलेटर को हटा लिया जाता है या उपचार रोक दिया जाता है, जिससे बीमारी अपनी स्वाभाविक गति से शरीर को शांत कर देती है।

गंभीर और असाध्य बीमारियों में स्वैच्छिक इच्छामृत्यु के पक्ष में मुख्य नैतिक तर्क क्या हैं?

समर्थकों का मुख्य तर्क व्यक्तिगत स्वायत्तता और आत्मनिर्णय का अधिकार है। उनका कहना है कि हर व्यक्ति को अपने शरीर पर पूरा अधिकार है, किसी को अमानवीय शारीरिक यातना सहने के लिए विवश नहीं किया जा सकता और मरीज को गरिमापूर्ण विदाई देना चिकित्सा का मानवीय कर्तव्य है।

इच्छामृत्यु की प्रथा के खिलाफ मुख्य नैतिक, धार्मिक और चिकित्सकीय आपत्तियां क्या हैं?

विरोधियों का मानना है कि जीवन ईश्वर प्रदत्त और पवित्र है जिसका अंत इंसान नहीं कर सकता। वे हिप्पोक्रेटिक शपथ का हवाला देते हैं और चेतावनी देते हैं कि कानूनी छूट मिलने पर वृद्धों और लाचारों पर परिवार और समाज का अनुचित दबाव बढ़ सकता है।

लिविंग विल (Living Will या अग्रिम चिकित्सा निर्देश) क्या है और भारत में इसकी कानूनी मान्यता क्या है?

लिविंग विल एक लिखित कानूनी दस्तावेज है जिसमें कोई व्यक्ति स्वस्थ मन से यह तय करता है कि भविष्य में असाध्य बीमारी या कोमा की स्थिति में उस पर कौन से जीवन रक्षक उपाय लागू न किए जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इसे संवैधानिक रूप से वैध माना और 2023 में इसकी प्रक्रिया को और सरल बना दिया।

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