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इंटरनेट का अधिकार: महामारी के सबक, सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण और डिजिटल समानता का संघर्ष

दूरस्थ शिक्षा, टेलीमेडिसिन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए डिजिटल कनेक्टिविटी की अपरिहार्यता का विश्लेषण।

Illuminated global digital network grid connecting continents at night - access to internet as a fundamental right digital divide equality

वर्ष 2021 के वसंत में, जब कोविड-19 महामारी की विनाशकारी दूसरी लहर ने पूरे भारत को अपनी चपेट में ले लिया, तब अस्पतालों के इमरजेंसी टेलीफोन स्विचबोर्ड बेबसी की अंतहीन पुकारों के नीचे चरमरा गए।

1. डिजिटल जीवन-रेखा: जब नेटवर्क कनेक्टिविटी जीवन और मृत्यु की विभाजक रेखा बन गई

नागरिकों की सामूहिक ऑनलाइन एकजुटता ने कैसे सिद्ध किया कि इंटरनेट एक अपरिहार्य सार्वजनिक उपयोगिता है

वर्ष 2021 के वसंत में, जब कोविड-19 महामारी की विनाशकारी दूसरी लहर ने पूरे भारत को अपनी चपेट में ले लिया और स्वास्थ्य तंत्र को अपनी सीमा तक निचोड़ दिया, तब अस्पतालों के इमरजेंसी टेलीफोन स्विचबोर्ड बेबसी की अंतहीन पुकारों के नीचे चरमरा गए। मेडिकल ऑक्सीजन के संयंत्र मांग के अप्रत्याशित दबाव में हांफने लगे और आधिकारिक प्रशासनिक आपदा मोचन तंत्र एक गंभीर पक्षाघात का शिकार हो गया। मानवीय संकट की उस अत्यंत भयावह घड़ी में डिजिटल स्क्रीनों के आर-पार एक अभूतपूर्व नागरिक जागृति का जन्म हुआ: सॉफ्टवेयर इंजीनियरों, विश्वविद्यालय के छात्रों, स्वतंत्र पत्रकारों और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने माइक्रोब्लॉगिंग फीड्स, मैसेजिंग ग्रुप्स और साझा ऑनलाइन स्प्रेडशीट्स को एक तात्कालिक राष्ट्रीय आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क में रूपांतरित कर दिया।

दिल्ली में आईसीयू वेंटिलेटर की तलाश में भटकता एक असहाय परिवार सोशल मीडिया पर एक संदेश प्रसारित करता था; और कुछ ही पलों के भीतर बेंगलुरु या मुंबई में बैठा कोई अज्ञात स्वयंसेवक शहर के दूसरे कोने में खाली पड़े अस्पताल के बिस्तर की पुष्टि करता, परिवार को किसी एम्बुलेंस चालक से जोड़ता और आपातकालीन ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था करवाता। हजारों मानव जीवन, जिनके लिए औपचारिक प्रशासनिक तंत्र से समय पर सहायता मिलना असंभव हो चुका था, केवल डिजिटल डेटा पैकेट्स के विकेंद्रीकृत, वास्तविक समय के संप्रेषण के माध्यम से काल के गाल में समाने से बचा लिए गए। इस भीषण अग्निपरीक्षा ने जनमानस के अंतर्मन में एक निर्विवाद सत्य स्थापित कर दिया: इंटरनेट की पहुंच अब विलासिता या मात्र मनोरंजन का साधन नहीं है; यह जीवन और मृत्यु के बीच की सबसे बुनियादी जीवन-रेखा बन चुकी है।

तालाबंदी के उन कठिन महीनों और उसके बाद के आर्थिक पुनरुत्थान के दौर में मानव समाज की लगभग हर आवश्यक गतिविधि डिजिटल माध्यम के सहारे ही संचालित हुई: प्राथमिक शालाओं से लेकर विश्वविद्यालयों तक की ऑनलाइन कक्षाएं, आपातकालीन टेली-परामर्श, परिवारों के जीवनयापन का आधार बनी वर्क-फ्रॉम-होम व्यवस्था, वित्तीय राहत का प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत खाद्य सामग्री का सत्यापन। परंतु क्लाउड आधारित इस आकस्मिक विस्थापन ने समाज के भीतर मौजूद वर्गभेद और ढांचागत विषमता पर भी एक तीखा प्रकाश डाला। जिनके पास निर्बाध ऑप्टिकल फाइबर ब्रॉडबैंड और आधुनिक उपकरण थे, वे अपने स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की रक्षा करने में सफल रहे; जबकि इस कनेक्टिविटी से वंचित करोड़ों लोग आधुनिक सभ्यता के विकास से अचानक बहिष्कृत हो गए। इंटरनेट कनेक्टिविटी को एक गैर-परक्राम्य संवैधानिक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने की मांग कोई तकनीकी शिगूफा नहीं, बल्कि इक्कीसवीं सदी का सबसे बड़ा नागरिक अधिकार आंदोलन है।

महामारी के प्रत्यक्ष अनुभवों ने यह अकाट्य रूप से सिद्ध कर दिया कि डिजिटल अलगाव आज के युग में एक तरह से नागरिक जीवन के खात्मे के समान है। इंटरनेट से वंचित व्यक्ति केवल मनोरंजन से दूर नहीं होता, बल्कि वह जीवन रक्षक स्वास्थ्य सेवाओं, बच्चों की अनिवार्य शिक्षा और सरकारी भरण-पोषण के मौलिक अधिकारों से भी हाथ धो बैठता है। इसलिए दूरसंचार बुनियादी ढांचे को केवल बाजार की मुनाफाखोरी पर निर्भर वाणिज्यिक वस्तु नहीं माना जा सकता, बल्कि इसे पीने के साफ पानी और बिजली की तरह अनिवार्य सार्वजनिक नागरिक अधिकार के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। (संबंधित विषयों पर अधिक गहन समझ के लिए हमारे विशेष निबंध असंभव केवल एक दृष्टिकोण है: अपनी सीमाओं को पार करने का संकल्प को भी पढ़ें।)

विचार: क्या कोई भी आधुनिक लोकतांत्रिक गणराज्य जीवन के अधिकार की गारंटी देने का दावा कर सकता है, जब वह नागरिकों को उस नेटवर्क से ही वंचित कर दे जिसके जरिए संकट में जीवन की गुहार लगाई जाती है?

2. वैश्विक सहमति: संयुक्त राष्ट्र और डिजिटल संविधानवाद का उदय

इंटरनेट की पहुंच को बुनियादी मानवाधिकार घोषित करने वाली अंतरराष्ट्रीय न्यायशास्त्र की विकास यात्रा

इंटरनेट तक पहुंच को एक अनिवार्य मानव अधिकार का दर्जा देने वाला अंतरराष्ट्रीय कानूनी सिद्धांत गहन कूटनीतिक और न्यायिक मंथन के पश्चात विकसित हुआ है। जून 2016 में, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें राजनीतिक असंतोष और लोकतांत्रिक संवाद को दबाने के लिए सरकारों द्वारा प्रायोजित इंटरनेट शटडाउन की दो टूक शब्दों में निंदा की गई। इस प्रस्ताव ने उस आधारभूत सिद्धांत को विधिवत स्थापित किया कि जो मानवाधिकार व्यक्तियों को भौतिक दुनिया में प्राप्त हैं, उनकी रक्षा डिजिटल परिवेश में भी उसी कठोरता से होनी चाहिए, विशेष रूप से मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के अनुच्छेद 19 के तहत प्रदत्त विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।

संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि ज्ञान-आधारित आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में इंटरनेट ही वह प्राथमिक माध्यम है जिसके जरिए आम नागरिक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग लेते हैं, वैज्ञानिक ज्ञान अर्जित करते हैं, शांतिपूर्ण सभाएं करते हैं और अपनी आर्थिक आजीविका सुनिश्चित करते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदकों ने अपनी रिपोर्टों में बार-बार आगाह किया कि ब्रॉडबैंड को केवल संपन्न वर्ग की विलासिता मानना समानता और गैर-भेदभाव के मूल संवैधानिक वादों को नष्ट करता है। इसके चलते राष्ट्र-राज्यों पर एक सकारात्मक दायित्व आयत होता है: उन्हें न केवल मनमाने सेंसरशिप और नेटवर्क ब्लैकआउट से बचना होगा, बल्कि हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए सस्ती और गुणवत्तापूर्ण डिजिटल संरचना स्थापित करने के लिए सार्वजनिक पूंजी का निवेश भी करना होगा।

विश्व के अनेक प्रगतिशील देशों ने इन वैश्विक सिद्धांतों को अपने घरेलू कानूनों में अत्यंत तत्परता से समाहित किया। एस्टोनिया वर्ष 2000 में अपने प्रत्येक नागरिक के लिए इंटरनेट पहुंच को कानूनी अधिकार घोषित करने वाला विश्व का पहला देश बना, जिसने सभी स्कूलों, पुस्तकालयों और सार्वजनिक चौराहों को मुफ्त वाई-फाई से जोड़ दिया। इसके बाद वर्ष 2010 में फिनलैंड ने एक ऐतिहासिक कानून बनाकर प्रत्येक नागरिक को न्यूनतम एक मेगाबिट प्रति सेकंड की गति वाला ब्रॉडबैंड उपलब्ध कराना कानूनी रूप से बाध्यकारी अधिकार बना दिया। इन समाजों ने यह भली-भांति समझ लिया कि ज्ञान के युग में डिजिटल निरक्षरता वास्तव में पारंपरिक निरक्षरता और सामाजिक पिछड़ेपन का ही आधुनिक रूप है।

कनेक्टिविटी को मौलिक अधिकार मानने का अर्थ यह है कि राज्य अब केवल निजी दूरसंचार कंपनियों के मुनाफे का मूकदर्शक नहीं रह सकता। राज्य का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह भौगोलिक रूप से दुर्गम क्षेत्रों और वंचित बस्तियों तक ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क पहुंचाए, रियायती इंटरनेट पैकेज उपलब्ध कराए और यह सुनिश्चित करे कि कोई भी बच्चा केवल कनेक्टिविटी के अभाव में अशिक्षित न रह जाए। (प्रामाणिक शोध और सांख्यिकीय संदर्भों के लिए United Nations High Commissioner for Human Rights (OHCHR) का संदर्भ लें।)

विचार: लोकतांत्रिक राष्ट्र किस नैतिकता के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपदेश दे सकते हैं, जब वे स्वयं घरेलू असंतोष को कुचलने के लिए इंटरनेट के स्विच बंद कर देते हैं?

3. भारतीय न्यायशास्त्र का ऐतिहासिक मोड़: अनुराधा भसीन और संवैधानिक माध्यम

इंटरनेट के माध्यम से मूल अधिकारों के संरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय का विश्लेषण

डिजिटल अधिकारों के संदर्भ में भारत का संवैधानिक न्यायशास्त्र दो युगांतरकारी अदالती फैसलों के माध्यम से अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचा। पहली महत्वपूर्ण न्यायिक सफलता सितंबर 2019 में मिली, जब केरल उच्च न्यायालय ने फहीमा शिरीन बनाम केरल राज्य के मामले में दूरदर्शी निर्णय सुनाया। अनिवार्य अध्ययन समय के दौरान अपना स्मार्टफोन जमा करने से इनकार करने पर जब एक छात्रा को कॉलेज छात्रावास से निष्कासित कर दिया गया, तब न्यायमूर्ति पी.वी. आशा ने स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी कि इंटरनेट तक पहुंच का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत शिक्षा के अधिकार और निजता के अधिकार का अभिन्न अंग है।

इसके चार महीने बाद, जनवरी 2020 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ के अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में निर्णय दिया, जिसने प्रशासनिक विधि की दिशा बदल दी। अगस्त 2019 में जम्मू और कश्मीर के संवैधानिक पुनर्गठन के उपरांत केंद्र सरकार ने पूरे क्षेत्र में मोबाइल नेटवर्क, ब्रॉडबैंड और लैंडलाइन सेवाओं पर अनिश्चितकालीन और पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था, जिससे लाखों नागरिक कई महीनों तक शेष विश्व से पूरी तरह कट गए। अखबार की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन ने इस प्रतिबंध को शीर्ष अदालत में चुनौती देते हुए सिद्ध किया कि इस पूर्ण ब्लैकआउट ने स्वतंत्र पत्रकारिता को पंगु बना दिया, अस्पतालों में आपातकालीन चिकित्सा रोक दी और स्थानीय व्यापार को बर्बाद कर दिया।

अपने नब्बे पृष्ठों के ऐतिहासिक संवैधानिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह युगांतरकारी सिद्धांत प्रतिपादित किया: न्यायालय ने स्पष्ट घोषणा की कि इंटरनेट के माध्यम से भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा किसी भी पेशे, व्यापार या कारोबार को संचालित करने की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) और अनुच्छेद 19(1)(छ) के तहत मौलिक अधिकार हैं। शीर्ष अदालत ने दूरसंचार सेवाओं के अनिश्चितकालीन और मनमाने निलंबन को असंवैधानिक करार दिया और यह अनिवार्य व्यवस्था दी कि किसी भी सरकारी प्रतिबंध को विधि-सम्मतता, अपरिहार्य आवश्यकता और आनुपातिकता (proportionality) के कठोर न्यायिक परीक्षण पर खरा उतरना होगा।

भसीन फैसले का सबसे गहरा दार्शनिक महत्व यह है कि इसने माना कि 21वीं सदी में इंटरनेट केवल एक तकनीकी उपकरण नहीं, बल्कि वह अपरिहार्य माध्यम है जिसके बिना अन्य मौलिक अधिकारों का प्रयोग व्यावहारिक रूप से असंभव है। इंटरनेट बंद करना आधुनिक दौर में समाचार पत्रों के छापेखानों को सील करने और नागरिक सभा स्थलों पर ताले जड़ने के बराबर है। इस निर्णय ने पुलिसिया सुविधा के लिए नेटवर्क बंद करने की मनमानी प्रशासनिक प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया। (संबंधित विषयों पर अधिक गहन समझ के लिए हमारे विशेष निबंध शरणार्थी संकट वैश्विक नैतिकता की विफलता को उजागर करता है को भी पढ़ें।)

विचार: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इंटरनेट को अनुच्छेद 19 के अधिकारों का अपरिहार्य माध्यम स्वीकार करना भारतीय संवैधानिक विधि में इतना युगांतरकारी बदलाव क्यों माना जाता है?

4. कड़वी जमीनी हकीकत: डिजिटल विभाजन और शैक्षणिक असमानता की गहरी खाई

ब्रॉडबैंड के अभाव ने किस तरह लाखों वंचित छात्र-छात्राओं के भविष्य पर कुठाराघात किया

यद्यपि संवैधानिक अदालतें फैसलों में डिजिटल स्वतंत्रता का उद्घोष करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी डिजिटल विभाजन की गहरी खाई से त्रस्त है। जब महामारी के दौरान स्कूल और कॉलेज बंद हुए और पठन-पाठन अचानक ज़ूम और ऑनलाइन पोर्टल्स पर स्थानांतरित हो गया, तब सार्वभौमिक डिजिटल पहुंच का भ्रम एक ही झटके में टूट गया। यूनिसेफ (UNICEF) और प्रथम संस्था की एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER) के सर्वेक्षणों से उजागर हुआ कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में पच्चीस प्रतिशत से भी कम परिवारों के पास स्थिर इंटरनेट कनेक्शन या उपयोग योग्य कंप्यूटर उपकरण उपलब्ध थे।

देश भर से अत्यंत मर्मस्पर्शी और हृदयविदारक कहानियां सामने आईं: केरल और उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों में बच्चे मोबाइल नेटवर्क का एक सिग्नल पकड़ने के लिए पथरीले रास्तों पर मीलों चलकर ऊंचे पेड़ों की फुनगियों और चट्टानों पर चढ़ते देखे गए; मलिन बस्तियों में एक ही कमरे में रहने वाले कई भाई-बहन एक पुराने टूटे स्क्रीन वाले स्मार्टफोन को बारी-बारी से इस्तेमाल करते थे, जिसका प्रीपेड डेटा पैक कक्षा के बीच में ही खत्म हो जाता था; और लाखों ग्रामीण किशोरियों को स्कूल की पढ़ाई हमेशा के लिए छोड़नी पड़ी क्योंकि गरीब परिवारों ने सीमित डेटा पैक केवल अपने बेटों की पढ़ाई के लिए आरक्षित कर दिया। इन वंचित बच्चों के लिए डिजिटल विभाजन केवल पढ़ाई का नुकसान नहीं था, बल्कि इसने उनकी जिंदगी को हमेशा के लिए बाल श्रम और कम उम्र के विवाह के दुष्चक्र में धकेल दिया।

यह भयावह खाई केवल स्कूली शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिक कल्याणकारी योजनाओं तक फैली हुई है। आज के भारत में, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के तहत राशन का उठाव इंटरनेट से जुड़े बायोमेट्रिक आधार सत्यापन पर निर्भर है; छोटे उद्यमों का पंजीकरण केवल ऑनलाइन पोर्टल पर होता है; और किसानों को अपनी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की जानकारी ई-नाम (e-NAM) डिजिटल मंडियों से मिलती है। जब किसी दूरदराज के गांव में मोबाइल टावर काम करना बंद कर देता है, तो कमजोर और निर्धन नागरिकों के लिए कल्याणकारी राज्य का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है।

डिजिटल विभाजन वास्तव में समाज की ऐतिहासिक आर्थिक विषमताओं को कई गुना बढ़ा देता है। डिजिटल कौशल और इंटरनेट से वंचित युवा आधुनिक ज्ञान-आधारित रोजगार की दौड़ में शुरू होने से पहले ही पिछड़ जाता है। इसलिए इंटरनेट कनेक्टिविटी को हर नागरिक तक पहुंचाना केवल एक तकनीकी लक्ष्य नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता का मूल संवैधानिक दायित्व है। (प्रामाणिक शोध और सांख्यिकीय संदर्भों के लिए Internet Society — Global Internet Report का संदर्भ लें।)

विचार: जब भोजन का अधिकार और बुनियादी सामाजिक सुरक्षा डिजिटल कनेक्टिविटी से बांध दी गई हो, तो नेटवर्क विफलता क्या भोजन के अधिकार का असंवैधानिक हनन नहीं है?

5. अंधकार का स्विच: इंटरनेट शटडाउन के आर्थिक, सामाजिक और मानवीय दुष्परिणाम

खुले लोकतांत्रिक समाज पर नेटवर्क ब्लैकआउट के अप्रत्याशित और विनाशकारी दुष्प्रभावों का मूल्यांकन

सर्वोच्च न्यायालय के सख्त दिशा-निर्देशों के बावजूद, स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा कानून-व्यवस्था के नाम पर इंटरनेट बंद करने की मनमानी प्रवृत्ति हमारे लोकतंत्र के माथे पर एक स्थायी घाव बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था एक्सेस नाउ (Access Now) के वार्षिक अध्ययनों के अनुसार, भारत लगातार कई वर्षों से विश्व में सबसे अधिक सरकारी इंटरनेट शटडाउन करने वाले देशों की सूची में शीर्ष पर रहा है – जहां स्थानीय विरोध प्रदर्शनों, चुनावों और यहां तक कि प्रतियोगी परीक्षाओं में नकल रोकने जैसे हास्यास्पद बहानों पर भी इंटरनेट की बत्ती गुल कर दी जाती है।

इन बेलगाम इंटरनेट शटडाउन का आर्थिक प्रभाव अत्यंत विनाशकारी सिद्ध हुआ है। एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जहां डिजिटल भुगतान क्रांति (UPI) जन-जन तक पहुंच चुकी है — जहां नुक्कड़ का चाय वाला, ऑटो रिक्शा चालक और गली का परचून व्यापारी केवल डिजिटल क्यूआर कोड के माध्यम से लेनदेन करते हैं —, मोबाइल डेटा बंद होते ही असंगठित अर्थव्यवस्था पूरी तरह ठप हो जाती है। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (ICRIER) के आर्थिक शोध बताते हैं कि बार-बार के शटडाउन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का प्रत्यक्ष नुकसान पहुंचाया है, आपूर्ति शृंखलाएं तोड़ी हैं और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा डिगाया है।

इससे भी अधिक भयावह नुकसान सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिक सुरक्षा के क्षेत्र में होता है। डेटा सेवा बंद होने पर एम्बुलेंस जीपीएस नेविगेशन के अभाव में जाम में फंस जाती हैं; अस्पतालों के आपातकालीन कक्ष क्लाउड पर मौजूद मरीज के जीवन रक्षक मेडिकल रिकॉर्ड नहीं देख पाते; और हिंसा या तनाव के दौरान भयभीत परिवार अपने स्वजनों की कुशलता जानने के लिए तड़पते रह जाते हैं। शांति स्थापित करने के बजाय, यह डिजिटल ब्लैकआउट एक ऐसा सूचना शून्यता पैदा करता है जिसमें अनियंत्रित अफवाहें और उन्मादी उन्माद जंगल की आग की तरह फैलते हैं।

इंटरनेट का अंधाधुंध निलंबन सामूहिक दंड (collective punishment) का एक रूप है जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। कुछ असामाजिक तत्वों पर काबू पाने के नाम पर करोड़ों निर्दोष नागरिकों की आजीविका, संवाद और स्वास्थ्य के साधनों को छीन लेना प्रशासनिक अक्षमता और आनुपातिकता के सिद्धांत का खुला उल्लंघन है। (संबंधित विषयों पर अधिक गहन समझ के लिए हमारे विशेष निबंध 21वीं सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप भारत की स्वास्थ्य प्रणाली को भी पढ़ें।)

विचार: क्या कोई भी परिपक्व लोकतंत्र किसी परीक्षा में नकल रोकने या स्थानीय प्रदर्शन को दबाने के लिए करोड़ों निर्दोष नागरिकों की स्वास्थ्य और आजीविका की जीवन-रेखा काटने को सही ठहरा सकता है?

6. संप्रभु साझा धरोहर: नेट न्यूट्रैलिटी और डिजिटल स्वतंत्रता की संरचना

आने वाली पीढ़ियों के लिए खुले, समावेशी और लोकतांत्रिक इंटरनेट की रक्षा का संकल्प

इंटरनेट तक पहुंच को वास्तविक मौलिक अधिकार बनाने के लिए केवल भौतिक केबलों और टावरों का जाल बिछाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इस माध्यम के भीतर प्रवाहित होने वाली सूचना की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता की रक्षा करना भी अनिवार्य है। नेट न्यूट्रैलिटी (नेट निष्पक्षता) का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि दूरसंचार और इंटरनेट सेवा प्रदाता सभी प्रकार के डेटा ट्रैफ़िक के साथ समान व्यवहार करें – किसी भी उपयोगकर्ता, सामग्री, वेबसाइट या एप्लिकेशन के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव, गति कम करना या व्यावसायिक पक्षपात न किया जाए।

कुछ वर्ष पूर्व, वैश्विक टेक एकाधिकारों ने "जीरो-रेटिंग" प्लेटफॉर्म्स (जैसे फेसबुक का फ्री बेसिक्स) के माध्यम से वंचित तबकों को कथित तौर पर मुफ्त इंटरनेट देने का प्रलोभन दिया था, परंतु वास्तव में यह कंपनी द्वारा चुने गए कुछ खास पोर्टल्स तक सीमित एक बंद डिजिटल जेल थी। भारत के लाखों जागरूक नागरिकों, तकनीकविदों और छात्र संगठनों ने इसके विरुद्ध एक विशाल राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन खड़ा किया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने 2016 में भेदभावपूर्ण डेटा टैरिफ पर ऐतिहासिक प्रतिबंध लगा दिया। जनता ने यह भली-भांति समझा कि एकाधिकारवादी कंपनियों द्वारा नियंत्रित दोयम दर्जे का इंटरनेट सशक्तीकरण नहीं, बल्कि डिजिटल सामंतवाद है।

आगे की लोकतांत्रिक राह यह मांग करती है कि उच्च गति वाले ब्रॉडबैंड को जल आपूर्ति, विद्युत ग्रिड और राष्ट्रीय राजमार्गों की भांति एक आवश्यक सार्वजनिक उपयोगिता माना जाए। भारतनेट (BharatNet) जैसी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं को, जिनका उद्देश्य देश की सभी ढाई लाख ग्राम पंचायतों को हाई-स्पीड ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ना है, पूर्ण पारदर्शिता और उच्च गुणवत्ता के साथ समयबद्ध रूप से पूरा किया जाना चाहिए। जब हर गांव का प्राथमिक विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र और पंचायत कार्यालय वैश्विक ज्ञान के महासागर से तीव्र गति से जुड़ जाएगा, तब हम केवल मशीनों को नहीं जोड़ेंगे, बल्कि 1.4 अरब नागरिकों की असीम क्षमताओं को पंख देंगे।

खुला इंटरनेट आधुनिक मानव सभ्यता की सबसे मूल्यवान साझी बौद्धिक धरोहर है। इसे सत्ता की दमनकारी सेंसरशिप और बहुराष्ट्रीय डेटा एकाधिकारों की मुनाफाखोरी से बचाना हमारे दौर का सबसे बड़ा ऐतिहासिक दायित्व है, ताकि आने वाली पीढ़ियां एक स्वतंत्र, जागरूक और न्यायसंगत डिजिटल संसार में सांस ले सकें। (प्रामाणिक शोध और सांख्यिकीय संदर्भों के लिए International Telecommunication Union (ITU) का संदर्भ लें।)

विचार: क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक खुला और लोकतांत्रिक डिजिटल संसार सौंपेंगे, या कॉरपोरेट पहरेदारी और निगरानी तंत्र से घिरी एक संकुचित डिजिटल जेल?

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

संयुक्त राष्ट्र ने इंटरनेट तक पहुंच को एक मौलिक मानवाधिकार क्यों घोषित किया है?

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने स्पष्ट किया है कि डिजिटल युग में विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शिक्षा, शांतिपूर्ण सभा और आर्थिक अवसरों का लाभ उठाने के लिए इंटरनेट की पहुंच अनिवार्य शर्त है।

अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) के ऐतिहासिक फैसले का क्या महत्व है?

सर्वोच्च न्यायालय ने घोषित किया कि इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यापार करने का अधिकार अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकार हैं, और अनिश्चितकालीन इंटरनेट शटडाउन को असंवैधानिक ठहराया।

डिजिटल विभाजन सामाजिक और आर्थिक असमानता को कैसे गहरा करता है?

ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी के अभाव में गरीब बच्चे ऑनलाइन शिक्षा से वंचित रह जाते हैं और ग्रामीण आबादी टेलीमेडिसिन, डिजिटल बैंकिंग व सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से कट जाती है, जिससे गरीबी का दुष्चक्र बना रहता है।

किसी लोकतांत्रिक देश में सरकार किन कानूनी शर्तों के तहत इंटरनेट सेवाओं को सीमित कर सकती है?

किसी भी प्रतिबंध का स्पष्ट कानूनी आधार होना चाहिए, वह पूर्णतः अस्थायी होना चाहिए, अपरिहार्य सार्वजनिक आवश्यकता पर आधारित होना चाहिए और आनुपातिकता (proportionality) के न्यायिक परीक्षण पर खरा उतरना चाहिए।

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